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सिलाई मशीन और जिंदगी

काश! ये जिंदगी होती एक सिलाई मशीन और करती रफू उन रिश्तो को जो फट चुके हैं आज हल्की सी चोट या विश्वासघात से  काश! तुरप पाती मेरी और परिवार की गलतियों को मेरी मां की तरह और जो सिलकर बचाती सभी रिश्तों को एक ही भाव से काश! ये सिलती मोटे-पतले, काले-गोरे, हिंदू-मुसलमान सिख-ईसाई और शादी का जोड़ा या कफन को बिना भेद-भाव के काश! ये सिलती उस दुपट्टे को जो फटा किसी के आंचल से खींचते समय और देखती स्त्री-पुरुष के कपड़ों को समान भाव से काश! ये सहती खुद में चुभती एक सुई, मिन्नतें करती सिटिल से और अपनी सहनशक्ति से दो धागों एक करती कपड़े पर उसी भाव से दिनांक-14/06/2020                                                    लेखक-                                                दुष्यंत बाबा

नीड़ के लिए

हर शख्स बेचैन था नीड़ के लिए। भीड़ ही भाग रही थी भीड़ के लिए।।        तूफानों से सामना तो हर रोज होता था।        हर रोज खोकर ही कुछ रोज पाता था।।        क्या कमाया, क्या गंवाया समझ नहीं आता था।         हां! सोने से पहले पेट तो जरूर भर जाता था।।  जीवन में समय की कमी ही कमी थी।  मां से भी बात होती कभी ही कभी थी।।   समय की कमी से अब घर टूटने लगे थे।   पति से पत्नी, पत्नी से पति छूटने लगे थे।।         आशंका की आहट थी और सन्नाटा छा गया।         कुछ समझने से पहले ही कोरोना आ गया।।         आपदा ऐसी कि अब लॉक डाउन तो जरूरी था।         जीने के लिए घरों में अब बंद रहना मजबूरी था।। देखते ही देखते जीने की फिजाएं बदल गयीं। नदियों का पानी, शहर की हवाएं बदल गयीं।। पशु-पक्षियों के रहने की अब अदाएं बदल गयीं। बहुसंख्यक शहरों की अब संख्याएं बदल गयीं।।          जो कभी इस शहर को अपने पसीने से सींचत...