सिलाई मशीन और जिंदगी
काश! ये जिंदगी होती एक सिलाई मशीन और करती रफू उन रिश्तो को जो फट चुके हैं आज हल्की सी चोट या विश्वासघात से काश! तुरप पाती मेरी और परिवार की गलतियों को मेरी मां की तरह और जो सिलकर बचाती सभी रिश्तों को एक ही भाव से काश! ये सिलती मोटे-पतले, काले-गोरे, हिंदू-मुसलमान सिख-ईसाई और शादी का जोड़ा या कफन को बिना भेद-भाव के काश! ये सिलती उस दुपट्टे को जो फटा किसी के आंचल से खींचते समय और देखती स्त्री-पुरुष के कपड़ों को समान भाव से काश! ये सहती खुद में चुभती एक सुई, मिन्नतें करती सिटिल से और अपनी सहनशक्ति से दो धागों एक करती कपड़े पर उसी भाव से दिनांक-14/06/2020 लेखक- दुष्यंत बाबा